Nature, the most soothing thing in the world, is usually forgotten in the hectic schedules we have.
My trekking experience through the western Ghats in Pune gave me a chance to kindle with it again..
Trust me, I was never this close to nature.. And this certainly changed me within..
This poem below talks about "The euphoric state of being"..
Happy Reading!
प्रकृति का स्पर्श
वो मीठी मिट्टी थोड़ी गीली हुई
थोड़ी नाज़ुक थोड़ी शर्मीली हुई
वो बूंदा बांदी अब बारिश हुई
हाँ आज ये प्रकृति सोहानी हुई
वो फूलों का खिलना, वो कलियों का मिलना
ये तो तकदीर में लिखा ही था
पर आज ये कलियाँ दीवानी हुई
हाँ आज ये पवन मस्तानी हुई
दूर कहीं गगन में जो हल्का बादल गरजता था
जिसकी एक पुकार को दिल सदियों से तरसता था
आज वो पानी सरिता हुई
थोड़ी बहकी थोड़ी छलकी हुई
खिलने लगी अब कली कली
वो पंकज भी अब खिल उठा
जिनेश हुआ मन गली गली
वो पर्वत मुझसे मिल उठा
वो सुन्दरता, वो मेह्कापन
अब मेरे मन की पूजा बनी
प्रकृति की नज़दीकियों में
मैं भी अब जपलीन हुई
बस गया वो साँसों में
ऐसा नशा उसका चढ़ा
घुल गया वो धड़कन में
हाँ आज ये मन प्रशांत हुआ
विचलित मन को रिधिमा मिली
ये प्रकृति जब छूने लगी
ये प्रकृति ही श्रेया बनी
जो मन का शोर मिटा सकी
मैं खो गयी इस दुनिया में
अब दृष्टि का तो होश नहीं
हिमांशु का जो स्मरण हुआ
दिल झूम उठा और जोश वही
एक अनकही सी सरगम अब
मेरा अनुभव गाती है
ये हवाएँ मेरी ज़िन्दगी में
एक अनुपम लम्हा लाती हैं
दूर हूँ मैं उस दुनिया से
जो उलझनों को रोती है
ये अब मेरी दुनिया है
जो हर्ष उल्लास की मोती है
P.S. Dedicated to my friends who helped me walk down those difficult paths.. (Thankyou Drishti, Japleen, Himanshu, Jinesh, Ridhima, Anupam, Shreya, Prashant, Pooja, Sarita, Pankaj)
My trekking experience through the western Ghats in Pune gave me a chance to kindle with it again..
Trust me, I was never this close to nature.. And this certainly changed me within..
This poem below talks about "The euphoric state of being"..
Happy Reading!
प्रकृति का स्पर्श
वो मीठी मिट्टी थोड़ी गीली हुई
थोड़ी नाज़ुक थोड़ी शर्मीली हुई
वो बूंदा बांदी अब बारिश हुई
हाँ आज ये प्रकृति सोहानी हुई
वो फूलों का खिलना, वो कलियों का मिलना
ये तो तकदीर में लिखा ही था
पर आज ये कलियाँ दीवानी हुई
हाँ आज ये पवन मस्तानी हुई
दूर कहीं गगन में जो हल्का बादल गरजता था
जिसकी एक पुकार को दिल सदियों से तरसता था
आज वो पानी सरिता हुई
थोड़ी बहकी थोड़ी छलकी हुई
खिलने लगी अब कली कली
वो पंकज भी अब खिल उठा
जिनेश हुआ मन गली गली
वो पर्वत मुझसे मिल उठा
वो सुन्दरता, वो मेह्कापन
अब मेरे मन की पूजा बनी
प्रकृति की नज़दीकियों में
मैं भी अब जपलीन हुई
बस गया वो साँसों में
ऐसा नशा उसका चढ़ा
घुल गया वो धड़कन में
हाँ आज ये मन प्रशांत हुआ
विचलित मन को रिधिमा मिली
ये प्रकृति जब छूने लगी
ये प्रकृति ही श्रेया बनी
जो मन का शोर मिटा सकी
मैं खो गयी इस दुनिया में
अब दृष्टि का तो होश नहीं
हिमांशु का जो स्मरण हुआ
दिल झूम उठा और जोश वही
एक अनकही सी सरगम अब
मेरा अनुभव गाती है
ये हवाएँ मेरी ज़िन्दगी में
एक अनुपम लम्हा लाती हैं
दूर हूँ मैं उस दुनिया से
जो उलझनों को रोती है
ये अब मेरी दुनिया है
जो हर्ष उल्लास की मोती है
P.S. Dedicated to my friends who helped me walk down those difficult paths.. (Thankyou Drishti, Japleen, Himanshu, Jinesh, Ridhima, Anupam, Shreya, Prashant, Pooja, Sarita, Pankaj)
Sohani ki sohani kavita se mann sohana hogaya... :) beautiful!
ReplyDeleteSuper girl! :)
ReplyDeleteThankyou Japleen..
DeleteI just loved the poem..!! Loved it.. Trust me, its after 10 years.. 10 long years that I read so much of Hindi.. Keep it up.. Beautiful words..!!
ReplyDeleteThankyou for your generous comments Avishkar.. Dun worry.. my next few blogs will be in English..
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